परछाइयों के पीछे – एक अपराध session 1 E-7 to E-10 the end



अध्याय 7: मौत की घड़ी

काशीपुरा की गलियाँ उस शाम असामान्य रूप से शांत थीं। चाय की दुकानें समय से पहले बंद हो गई थीं, और मोहल्ले के कुछ मकानों के दरवाज़े अंदर से कुंडी लगे हुए थे – जैसे किसी अनदेखे तूफान का डर सबको था।

राघव को एक अनजान नंबर से कॉल आया – आवाज़ में सिर्फ एक वाक्य था:

"अगर ज़िंदा रहना है, तो वो ड्राइव भुल जाओ । वरना अगली चुप्पी तुम्हारी होगी… हमेशा के लिए।"



राघव ने बिना कुछ कहे कॉल काट दिया।
नीलम चाची डर में थीं, पर अब वो पहले जैसी नहीं रहीं – उनका डर अब जंग में बदल चुका था।

उसी रात एक अजनबी शख्स ने नीलम चाची के दरवाज़े पर दस्तक दी। उसके हाथ में गुलाब था… और कमर पर छिपा हुआ एक तमंचा।

लेकिन राघव ने पहले ही तैयारी कर रखी थी – CCTV कैमरे, दरवाज़े पर अलार्म, और ऊपर छत पर छुपा हुआ इंस्पेक्टर जोशी। जैसे ही शख्स ने तमंचा निकाला, दरवाज़ा खुला और उसे चारों ओर से घेर लिया गया।

पहली गिरफ्तारी हो चुकी थी।




अध्याय 8: साजिश की जड़ें

गिरफ्तार व्यक्ति ने पुलिस को एक नाम बताया – राठौर का दायाँ हाथ – "धोबीघाट वाला बबलू", जो जमीन के सारे कागज़ी खेल का मास्टरमाइंड था। पुलिस ने उसके ठिकानों पर छापे मारे और एक गुप्त तहखाने में दर्जनों जाली दस्तावेज़, सरकारी सीलें, और बंदूकें बरामद कीं।

अब यह सिर्फ एक स्थानीय अपराध नहीं रह गया था – यह राजनीति, जमीन माफिया और पुलिस के कुछ भीतरघातियों की गहरी साज़िश थी।



अध्याय 9: सच का मोल

जनसुनवाई के दिन चाची और राघव को पुलिस सुरक्षा में सभागार लाया गया। वहां मीडिया, प्रशासन और सैकड़ों नागरिक मौजूद थे।

राघव ने फ्लैश ड्राइव से सारे सबूत सार्वजनिक किए – फोटो, दस्तावेज़, ऑडियो क्लिप। एक पल के लिए पूरा हॉल सन्नाटे में चला गया।

तभी एक कोने से गोली चली… निशाना चाची थीं। लेकिन सामने आकर राघव ने खुद को ढाल बना लिया।

भीड़ में अफरा-तफरी मच गई, लेकिन इंस्पेक्टर जोशी ने तुरंत हमलावर को धर दबोचा। राघव घायल तो हुआ, पर ज़िंदा था। और सबसे बड़ी बात – सच ज़िंदा था।



अध्याय 10: परछाइयों का अंत

कुछ हफ्तों बाद राठौर को गिरफ्तार किया गया। अदालत ने उसे और उसके गिरोह को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई।
नीलम चाची को उनके पति की मौत का न्याय मिला।
और राघव?
उसने काशीपुरा छोड़ दिया, लेकिन उसकी रिपोर्ट “परछाइयों के पीछे” ने पूरे देश में तहलका मचा दिया।

आज भी लोग जब बनारस की गलियों से गुजरते हैं, तो एक दीवार पर लिखा दिखता है:

“झूठ चाहे जितना भी गहरा हो, एक दिन सच की रौशनी उसे मिटा ही देती है।”


समाप्त


(Fictional Disclaimer):

यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है। इसमें वर्णित सभी पात्र, स्थान, और घटनाएं लेखक की कल्पना का परिणाम हैं। किसी जीवित या मृत व्यक्ति से इसका कोई संबंध मात्र संयोग है। यह कहानी मनोरंजन एवं साहित्यिक उद्देश्य से लिखी गई है। लेखक किसी भी प्रकार की असामाजिक, अवैध या अनैतिक गतिविधियों को प्रोत्साहित नहीं करता।

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