"तुम सोच भी नहीं सकते, मैं कितनी दूर जा सकती हूँ बस एक मौका पाने के लिए," उसने कहा और आंखों में कुछ ऐसा चमक था जो डराने वाला था।
नाम था काव्या — एक छोटे शहर से आई, बड़ी ख्वाहिशों वाली लड़की। उसे लगता था कि उसके पास सिर्फ दो रास्ते हैं: या तो गरीबी में घुट-घुटकर मरना, या खुद को इस्तेमाल करके इस दुनिया से अपना हिस्सा छीन लेना।
दिल्ली की चमकती रौशनी में कदम रखते ही उसने महसूस किया, ये शहर तुम्हें तभी स्वीकार करता है जब तुम उसके नियमों पर चलो... या उन्हें तोड़कर नया रास्ता बनाओ।
भाग 1: शुरुआत
काव्या ने शुरुआत एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी में मॉडल बनकर की। जल्दी ही उसे पता चला कि ये दुनिया वैसी नहीं जैसी बाहर से दिखती है। हर मुस्कान के पीछे एक सौदा होता है।
शो में उससे एक अमीर बिजनेसमैन, अद्विक ने संपर्क किया। हैंडसम, रहस्यमयी और बेहद प्रभावशाली। उसने काव्या को ऑफर दिया – सिर्फ डिनर साथ में करने का, बिना किसी शर्त के। काव्या जानती थी कि यह सिर्फ शुरुआत है, लेकिन वह भी खेल खेलना जानती थी।
भाग 2: सौदे का खेल
काव्या ने खुद को महज एक डिनर से ज़्यादा में तब्दील कर दिया — एक रहस्य, एक लालच, एक जरिया जिससे वो लोगों के अंदर की कमजोरी को भांप सके।
उसने धीरे-धीरे अद्विक के नेटवर्क तक पहुंच बना ली। बिजनेस पार्टीज़, हाई-प्रोफाइल गेट-टुगेदर, पॉलिटिकल कनेक्शन — वो हर जगह मौजूद थी, लेकिन एक मकसद के साथ। पैसे कमाना। हर सौदा सोच-समझकर किया गया। हर झूठ, एक नई सीढ़ी बना।
लेकिन इसी खेल में, एक दिन कुछ असली हो गया — अद्विक के साथ उसका रिश्ता।
भाग 3: रोमांस या चाल?
काव्या को नहीं पता चला कि कब अद्विक की मुस्कुराहट में वो खुद को ढूंढने लगी। उसने उसे समझा, सराहा और उस पर भरोसा भी किया। लेकिन क्या ये प्यार था या फिर एक और चाल?
एक रात, जब अद्विक ने उससे कहा, "काव्या, मुझे फर्क नहीं पड़ता कि तुमने क्या किया, मैं तुम्हें वैसे ही चाहता हूँ," तो उसकी आंखों में आंसू आ गए।
लेकिन तभी एक और सच्चाई सामने आई — अद्विक खुद एक अंडरकवर इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट था, जो हाई-प्रोफाइल सेक्स रैकेट और फाइनेंशियल स्कैम्स का पर्दाफाश कर रहा था। और काव्या इस स्कैंडल की सबसे बड़ी कड़ी बन चुकी थी।
भाग 4: सस्पेंस की गिरफ़्त
काव्या को समझ आ गया कि अब खेल खत्म हो चुका है। वो अब सिर्फ एक प्यादे की तरह नहीं थी, बल्कि पूरी कहानी की चाभी थी।
पुलिस को उसके पास से सैकड़ों फोटो, ऑडियो रिकॉर्डिंग और ब्लैकमेल के सबूत मिले। मगर हैरानी की बात ये थी — वो खुद चलकर थाने गई।
उसने सब कुछ कबूल किया, लेकिन एक शर्त पर — अद्विक का नाम कहीं नहीं आना चाहिए। "मैंने खुद का इस्तेमाल किया, लेकिन उसके लिए नहीं… अपने लिए। जो मैंने पाया, वो अब नहीं चाहिए।"
भाग 5: मोड़
तीन महीने बाद, दिल्ली की एक नई नॉवेल लॉन्च हुई — "शह और मात" — जिसकी लेखिका थी काव्या मल्होत्रा।
यह किताब एक लड़की की कहानी थी जो पैसे कमाने के लिए खुद को एक प्रोडक्ट बना बैठी, लेकिन उसी खेल में अपने ही नियम बना गई।
अद्विक उस बुक लॉन्च में नहीं था। पर किताब के आखिरी पन्ने पर लिखा था:
"कभी-कभी इंसान खुद को खो देता है, सिर्फ यह जानने के लिए कि असली जीत पैसे की नहीं, पहचान की होती है।"
यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है और इसका उद्देश्य सिर्फ भावनात्मक जागरूकता फैलाना है। इसमें वर्णित पात्र, स्थान और घटनाएं किसी वास्तविक व्यक्ति या परिस्थिति से मेल खाएं, तो यह संयोग मात्र होगा।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें